*पंडित भारत भूषण शास्त्री ने श्री श्याम मंदिर परिसर में श्रीमद् भागवत ज्ञान कथा में गोवर्धन लीला एवं रुक्मणी विवाह पर दिया जीवंत प्रवचन*

रायगढ़, श्रावण शुक्ल पक्ष द्वादशी तिथि को श्री श्याम सरकार महिला मंडल द्वारा आयोजित श्रीमद् भागवत कथा में रायगढ़ अंचल के जाने-माने कथा वाचक, पंडित श्री श्री भारत भूषण शास्त्री जी के द्वारा कथा के वाचन के माध्यम से ज्ञान की अविरल धारा प्रवाहित हो रही है। जिसमें उन्होंने 24 अगस्त दिन शुक्रवार को गोवर्धन लीला और रुक्मणी विवाह पर अपनी अद्भुत प्रस्तुति दी। भगवान श्री कृष्ण के गोवर्धन लीला के अंतर्गत शास्त्री जी ने भक्तों को इस बात से अवगत कराया, कि उस समय बृजवासियों के मन में एक डर था कि भगवान इंद्र हमको भांती भांती से परेशान करेंगे, वह हमें वर्षा के रूप में जल नहीं देंगे तो हमारे फसल नहीं होंगे , लोग पानी पीने से वंचित रहकर तड़प तड़प कर मृत्यु को प्राप्त हो जाएंगे, हमारी गाय और अन्य जीव जंतु पानी के बगैर तरसती रहेगी। इन सब बातों का डर बृजवासियों के मन में भरा हुआ था ,भगवान श्री कृष्ण उन्हें यह समझाने में सफल रहे कि हमारे देवता इंद्र नहीं बल्कि हमारे देवता गिरिराज जी हैं और उनकी पूजा से हम धन-धान्य और संपन्नता को प्राप्त करेंगे। 

 भगवान श्री कृष्ण की बातों को मानकर समस्त बृजवासी गिरिराज जी के दर्शन को चले गए और उनकी पूजा अर्चना के पश्चात वापस ब्रज आ गए, इस दौरान भगवान इंद्र ने अपना रूप दिखाते हुए जोरदार वर्षा से ब्रज की भूमि को आच्छादित कर दिया उस समय फिर से भगवान कृष्ण ने अपनी लीला दिखाते हुए अपनी चिनी उंगली में गिरिराज जी को उठा लिया और सारे बृजवासी गिरिराज पर्वत के नीचे सुरक्षित महसूस किये ।

जब भगवान इंद्र ने उनका यह रूप देखा तो वह स्वयं आकर भगवान श्री कृष्ण से क्षमा याचना किया और भविष्य में बृजवासियों को अपना आशीर्वाद प्रदान करने और उन्हें कभी परेशान न करने का वचन दिया।

गोवर्धन लीला के पश्चात पंडित भारत भूषण शास्त्री जी ने खचाखच भरी पंडाल में उपस्थित भक्तों को अपनी ओजस्वी वाणी से इस बात का ज्ञान कराया की गोवर्धन लीला के पश्चात भगवान अपने मामा कंस के मल युद्ध के आमंत्रण पर अपनी मैया से जिद करके मथुरा के लिए रवाना हुए। मल युद्ध तो केवल एक बहाना था, वास्तव में कंस को भगवान श्री कृष्ण को मथुरा बुलाना था। भगवान श्री कृष्णा भी अपनी मैया से जिद करके अपनी मैया को मथुरा विदा करने के लिए तैयार करते हैं, और अंत में मैया मान जाती है,और भगवान कृष्ण और बलराम दोनों भाई अपनी मित्र मंडली के साथ मथुरा प्रस्थान करते हैं । वहां पहुंचने के बाद भगवान कृष्ण को भान हो जाता है कि उनके मामा कृष्ण दोनों भाइयों और उनके मित्र मंडलियों के लिए  अपनी पूरी तैयारी कर रखी थी।

 भगवान श्री कृष्णा और उनके शखाओ के लिए विश मिश्रित भोजन आदि की व्यवस्था कर रखी थी , किंतु कृष्ण तो कृष्ण है वह अपनी लीलाओं से सारे भोजन को इधर-उधर फेंक देते हैं, और अपने लिए नए भोजन की व्यवस्था कर, सारे मित्र मंडली सहित भोजन का आनंद लेते हैं। तत्पश्चात मल युद्ध प्रारंभ होता है, मामा कंस मल्ल युद्ध में एक के जगह चार-चार बाहुबली राक्षसों को उनके सामने प्रस्तुत कर देते हैं, भगवान श्री कृष्ण चारों राक्षस को जमीन दोज करते हुए एक ही फलांग में कंस के आसन तक पहुंच जाते हैं और उन्हें याद दिलाते हैं की , याद करिए मामा, आपने मेरी मां का केश इसी तरह पकड़ा था, और कंस के केस पड़कर नीचे गिराते हुए बहुत देर तक युद्ध करने के बाद भगवान श्री कृष्णा अपने मामा कंस का वध कर देते है ।

   फिर व्यास पीठ पर बैठे शास्त्री जी ने रुक्मणी विवाह का प्रसंग प्रारंभ करते हुए उन्होंने बताया की कुंदक राज्य के राजा के छह संतान थे जिनमें पांच पुत्र और एक पुत्री रुक्मणी थी, राजा के बड़े पुत्र का नाम रुक्म था और उन्होंने अपनी बहन रुक्मणी का विवाह अपने मित्र शिशुपाल से तय कर दिया था।

 किंतु रुक्मणी के हृदय में तो भगवान श्री कृष्ण विराजे थे,  रुक्मणी ने अपने एक दूत भेज कर भगवान श्री कृष्ण को एक पत्र के रूप में उनसे विवाह का प्रस्ताव भेजा और उस पत्र को पढ़कर भगवान श्री कृष्ण , जब रुक्मणी गौरी पूजन के लिए मंदिर गई हुई थी, उस मंदिर से रुक्मणी का हाथ पकड़ कर द्वारकाधीश ले आए और वही रुक्मणी के साथ श्री कृष्ण का विवाह संपन्न हुआ।

कृष्ण रुक्मणी विवाह के दौरान बारात के रूप में श्री श्याम सरकार महिला मंडल के अध्यक्ष श्रीमती संगीता शर्मा, प्रिया शर्मा, रीना पालीवाल, नंदिनी गोयल, मोनिका अग्रवाल, कविता अग्रवाल, मनीषा मोदी, भारती मोदी, प्रियंका सिंघानिया, नंदिनी अग्रवाल, चंद्रकला अग्रवाल, प्रतिमा अग्रवाल, मंजू अग्रवाल, मंजू बोदिया,संगीता जिंदल, संगीता सरोगी, सुमन अग्रवाल, बबीता गेरा, किरण शर्मा, एवं करीमा अग्रवाल तथा बबीता अग्रवाल भगवान के विवाह गीत पर अपने पायलों की झंकार बिखेरती हुई और नृत्य करती हुई पूरे बारात की भूमिका में नजर आई।

 जो श्रद्धालु कथा स्थल पर किसी कारणवश ना पहुंच पाए उनके लिए संपूर्ण कथा का चित्रण विमल चौधरी ने अपनी लेखनी से की।

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