रक्षा बंधन भाई-बहन के अटूट प्रेम, विश्वास और स्नेह का पर्व है। इस दिन बहनें अपने भाई की कलाई पर राखी बांधकर उसकी लंबी उम्र, सुख-समृद्धि और खुशहाल जीवन की कामना करती हैं। भाई भी बहन की रक्षा और हर परिस्थिति में उसके साथ खड़े रहने का संकल्प लेता है।
सनातन धर्म में किसी भी शुभ कार्य से पहले मुहूर्त और पंचांग देखने की परंपरा रही है। यही कारण है कि रक्षा बंधन जैसे पवित्र पर्व पर भी भद्रा काल का विशेष ध्यान रखा जाता है। मान्यता है कि भद्रा के दौरान राखी बांधने से बचना चाहिए।
लेकिन आखिर भद्रा कौन हैं? उनका जन्म कैसे हुआ? पंचांग में उन्हें स्थान कैसे मिला और राखी बांधने के लिए भद्रा काल को अशुभ क्यों माना जाता है? आइए जानते हैं पूरी कहानी।
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कौन हैं भद्रा? जानिए पौराणिक कथा
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, भद्रा सूर्य देव और छाया की पुत्री तथा शनिदेव की बहन हैं। उनका स्वरूप अत्यंत उग्र बताया गया है। कहा जाता है कि उनका वर्ण काला, लंबे केश, बड़े दांत और भयंकर रूप था।
मान्यता है कि जन्म के बाद से ही भद्रा का स्वभाव बेहद उग्र था और वे यज्ञ तथा मांगलिक कार्यों में बाधा उत्पन्न करने लगी थीं। उनके इस स्वभाव से सूर्य देव भी चिंतित हो गए।
जब भद्रा के विवाह की बात चली तो उनके उग्र स्वभाव के कारण कई लोगों ने विवाह प्रस्ताव ठुकरा दिए। इसके बाद सूर्य देव ने ब्रह्मा जी से इस समस्या का समाधान पूछा।
ब्रह्मा जी ने भद्रा को दिया विशेष स्थान
पौराणिक मान्यता के अनुसार, ब्रह्मा जी ने भद्रा को एक निश्चित स्थान प्रदान किया। उन्हें कहा गया कि वे पृथ्वी, स्वर्ग और पाताल लोक में निर्धारित समय के अनुसार विचरण करें।
इस दौरान जो व्यक्ति शुभ कार्य करे और भद्रा का सम्मान न करे, उसके कार्य में बाधा उत्पन्न करने की शक्ति भद्रा को दी गई।
इसी मान्यता के आधार पर ब्रह्मदेव ने भद्रा को पंचांग के विष्टि करण में स्थान दिया।
पंचांग में कैसे मिला भद्रा को स्थान?
हिंदू पंचांग के पांच प्रमुख अंग माने जाते हैं—
तिथि, वार, नक्षत्र, योग और करण।
एक तिथि के दो भाग होते हैं और प्रत्येक भाग को करण कहा जाता है। कुल 11 करण माने गए हैं।
इनमें सात चर करण हैं—
बव, बालव, कौलव, तैतिल, गर, वणिज और विष्टि।
वहीं चार स्थिर करण हैं—
शकुनि, चतुष्पद, नाग और किंस्तुघ्न।
इनमें विष्टि करण को ही भद्रा कहा जाता है।
किन तिथियों में रहती हैं भद्रा?
ज्योतिषीय गणना के अनुसार भद्रा कुछ विशेष तिथियों के पूर्वार्द्ध और उत्तरार्द्ध में रहती हैं।
मान्यता के अनुसार—
शुक्ल पक्ष की अष्टमी और पूर्णिमा के पूर्वार्द्ध में
चतुर्थी और एकादशी के उत्तरार्द्ध में
कृष्ण पक्ष की तृतीया और दशमी के उत्तरार्द्ध में
सप्तमी और चतुर्दशी के पूर्वार्द्ध में
भद्रा का प्रभाव माना जाता है।
मान्यता है कि जब भद्रा पृथ्वी लोक में होती हैं, तब इस अवधि में शुभ एवं मांगलिक कार्य करने से बचना चाहिए।
भद्रा काल में राखी क्यों नहीं बांधते?
भद्रा काल को ज्योतिष में उग्र समय माना गया है। इसलिए इस दौरान विवाह, गृह प्रवेश और अन्य मांगलिक कार्यों के साथ-साथ राखी बांधने से भी बचने की परंपरा है।
पौराणिक कथाओं में रावण की बहन शूर्पणखा द्वारा भद्रा काल में राखी बांधने और उसके बाद रावण के विनाश की कथा का भी उल्लेख मिलता है। हालांकि यह कथा मुख्यतः लोकमान्यताओं और पौराणिक परंपराओं से जुड़ी मानी जाती है।
रक्षा बंधन 2026 पर नहीं होगी भद्रा की अड़चन!
रक्षा बंधन 2026 में 28 अगस्त, शुक्रवार को मनाया जाएगा।
ज्योतिषाचार्यों के अनुसार, इस दिन भद्रा सूर्योदय से पहले ही समाप्त हो जाएगी। ऐसे में भाई-बहन के इस पवित्र पर्व पर भद्रा के कारण राखी बांधने में बाधा नहीं रहेगी।
उपलब्ध पंचांग गणना के अनुसार रक्षा बंधन के दिन सुबह का शुभ समय भी भद्रा से मुक्त रहेगा।
इसलिए 2026 में भाई की कलाई पर राखी बांधने के लिए भद्रा की चिंता नहीं करनी होगी।
रक्षा बंधन केवल एक धागा बांधने का पर्व नहीं, बल्कि भाई-बहन के प्रेम, विश्वास, सम्मान और जीवनभर एक-दूसरे का साथ निभाने के संकल्प का पर्व है।
इस दिन राखी के धागे के साथ रिश्तों की मिठास और मजबूत हो—यही इस पावन पर्व का सबसे सुंदर संदेश है।
नोट: राखी बांधने के सटीक मुहूर्त के लिए अपने स्थानीय स्थान के अनुसार पंचांग की गणना देखना उचित रहेगा, क्योंकि मुहूर्त स्थान और सूर्योदय के समय के अनुसार कुछ अंतर हो सकता है।







